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शान्ति पर्व
अध्याय २०३
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गुरुरु उवाच
तथैव वेदशास्त्राणि लोकधर्मांश्च शाश्वतान् |  १४   क
प्रलय़े प्रकृतिं प्राप्य युगादौ सृजते प्रभुः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति