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शान्ति पर्व
अध्याय २०३
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गुरुरु उवाच
दीपादन्ये यथा दीपाः प्रवर्तन्ते सहस्रशः |  २४   क
प्रकृतिः सृजते तद्वदानन्त्यान्नापचीय़ते ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति