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शान्ति पर्व
अध्याय २०३
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गुरुरु उवाच
श्रोत्रं त्वक्चक्षुषी जिह्वा घ्राणं पञ्चेन्द्रिय़ाण्यपि |  २८   क
पादौ पाय़ुरुपस्थश्च हस्तौ वाक्कर्मणामपि ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति