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शान्ति पर्व
अध्याय २०३
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गुरुरु उवाच
स तु देहाद्यथा देहं त्यक्त्वान्यं प्रतिपद्यते |  ४३   क
तथा तं सम्प्रवक्ष्यामि भूतग्रामं स्वकर्मजम् ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति