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वन पर्व
अध्याय २०३
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व्याध उवाच
ततोऽस्य सर्वद्वन्द्वानि प्रशाम्यन्ति परस्परम् |  १०   क
न चास्य संय़मो नाम क्वचिद्भवति कश्चन ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति