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वन पर्व
अध्याय २०३
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व्याध उवाच
चित्तस्य हि प्रसादेन हन्ति कर्म शुभाशुभम् |  ३५   क
प्रसन्नात्मात्मनि स्थित्वा सुखमानन्त्यमश्नुते ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति