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मौसल पर्व
अध्याय ५
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो राजन्भगवानुग्रतेजा; नाराय़णः प्रभवश्चाव्ययश्च |  २३   क
योगाचार्यो रोदसी व्याप्य लक्ष्म्या; स्थानं प्राप स्वं महात्माप्रमेय़म् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति