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वन पर्व
अध्याय २०३
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व्याध उवाच
परिग्रहं परित्यज्य भव वुद्ध्या यतव्रतः |  ४७   क
अशोकं स्थानमातिष्ठेन्निश्चलं प्रेत्य चेह च ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति