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वन पर्व
अध्याय २०३
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व्याध उवाच
वैराग्यस्य हि रूपं तु पूर्वमेव प्रवर्तते |  ९   क
मृदुर्भवत्यहङ्कारः प्रसीदत्यार्जवं च यत् ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति