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शान्ति पर्व
अध्याय २२३
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वासुदेव उवाच
समाधिर्नास्य मानार्थे नात्मानं स्तौति कर्हिचित् |  १७   क
अनीर्ष्युर्दृढसम्भाषस्तस्मात्सर्वत्र पूजितः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति