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शान्ति पर्व
अध्याय २०४
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गुरुरु उवाच
हेतुय़ुक्ताः प्रकृतय़ो विकाराश्च परस्परम् |  १२   क
अन्योन्यमभिवर्तन्ते पुरुषाधिष्ठिताः सदा ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति