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शान्ति पर्व
अध्याय २०४
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गुरुरु उवाच
सरजस्कोऽरजस्कश्च स वै वाय़ुर्यथा भवेत् |  १४   क
तथैतदन्तरं विद्यात्क्षेत्रक्षेत्रज्ञय़ोर्वुधः |  १४   ख
अभ्यासात्स तथा युक्तो न गच्छेत्प्रकृतिं पुनः ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति