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शान्ति पर्व
अध्याय २०४
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गुरुरु उवाच
यथाश्वत्थकणीकाय़ामन्तर्भूतो महाद्रुमः |  २   क
निष्पन्नो दृश्यते व्यक्तमव्यक्तात्सम्भवस्तथा ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति