शान्ति पर्व  अध्याय २०४

गुरुरु उवाच

सर्वनीत्या सर्वगतं मनोहेतु सलक्षणम् |  ६   क
अज्ञानकर्म निर्दिष्टमेतत्कारणलक्षणम् ||  ६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति