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शान्ति पर्व
अध्याय २०४
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गुरुरु उवाच
अव्यक्तनाभं व्यक्तारं विकारपरिमण्डलम् |  ८   क
क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं चक्रं स्निग्धाक्षं वर्तते ध्रुवम् ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति