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वन पर्व
अध्याय २०४
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्तं व्राह्मणं ताभ्यां धर्मव्याधो न्यवेदय़त् |  १३   क
तौ स्वागतेन तं विप्रमर्चय़ामासतुस्तदा ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति