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वन पर्व
अध्याय २०४
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मार्कण्डेय़ उवाच
प्रतिगृह्य च तां पूजां द्विजः पप्रच्छ तावुभौ |  १४   क
सपुत्राभ्यां सभृत्याभ्यां कच्चिद्वां कुशलं गृहे |  १४   ख
अनामय़ं च वां कच्चित्सदैवेह शरीरय़ोः ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति