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वन पर्व
अध्याय २०४
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मार्कण्डेय़ उवाच
वाढमित्येव तौ विप्रः प्रत्युवाच मुदान्वितः |  १६   क
धर्मव्याधस्तु तं विप्रमर्थवद्वाक्यमव्रवीत् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति