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वन पर्व
अध्याय २०४
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मार्कण्डेय़ उवाच
त्रय़स्त्रिंशद्यथा देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः |  १८   क
सम्पूज्याः सर्वलोकस्य तथा वृद्धाविमौ मम ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति