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वन पर्व
अध्याय २०४
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मार्कण्डेय़ उवाच
उपहारानाहरन्तो देवतानां यथा द्विजाः |  १९   क
कुर्वते तद्वदेताभ्यां करोम्यहमतन्द्रितः ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति