वन पर्व  अध्याय २०४

मार्कण्डेय़ उवाच

न्याय़युक्तमिदं सर्वं भवता परिकीर्तितम् |  २   क
न तेऽस्त्यविदितं किञ्चिद्धर्मेष्विह हि दृश्यते ||  २   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति