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वन पर्व
अध्याय २०४
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मार्कण्डेय़ उवाच
एतावेवाग्नय़ो मह्यं यान्वदन्ति मनीषिणः |  २१   क
यज्ञा वेदाश्च चत्वारः सर्वमेतौ मम द्विज ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति