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द्रोण पर्व
अध्याय १६
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सञ्जय़ उवाच
भवतश्च प्रिय़ं यत्स्यादस्माकं च यशस्करम् |  १५   क
वय़मेनं हनिष्यामो निकृष्याय़ोधनाद्वहिः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति