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वन पर्व
अध्याय २०४
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मार्कण्डेय़ उवाच
स्वय़ं च स्नापय़ाम्येतौ तथा पादौ प्रधावय़े |  २३   क
आहारं सम्प्रय़च्छामि स्वय़ं च द्विजसत्तम ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति