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वन पर्व
अध्याय २०४
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मार्कण्डेय़ उवाच
अनुकूलाः कथा वच्मि विप्रिय़ं परिवर्जय़न् |  २४   क
अधर्मेणापि संय़ुक्तं प्रिय़माभ्यां करोम्यहम् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति