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वन पर्व
अध्याय २०४
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मार्कण्डेय़ उवाच
धर्ममेव गुरुं ज्ञात्वा करोमि द्विजसत्तम |  २५   क
अतन्द्रितः सदा विप्र शुश्रूषां वै करोम्यहम् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति