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वन पर्व
अध्याय २०४
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मार्कण्डेय़ उवाच
इत्युक्तः स प्रविश्याथ ददर्श परमार्चितम् |  ५   क
सौधं हृद्यं चतुःशालमतीव च मनोहरम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति