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वन पर्व
अध्याय २०४
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मार्कण्डेय़ उवाच
देवतागृहसङ्काशं दैवतैश्च सुपूजितम् |  ६   क
शय़नासनसम्वाधं गन्धैश्च परमैर्युतम् ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति