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वन पर्व
अध्याय २०४
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मार्कण्डेय़ उवाच
तत्र शुक्लाम्वरधरौ पितरावस्य पूजितौ |  ७   क
कृताहारौ सुतुष्टौ तावुपविष्टौ वरासने |  ७   ख
धर्मव्याधस्तु तौ दृष्ट्वा पादेषु शिरसापतत् ||  ७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति