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आदि पर्व
अध्याय २०५
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वैशम्पाय़न उवाच
उपप्रेक्षणजोऽधर्मः सुमहान्स्यान्महीपतेः |  १४   क
यद्यस्य रुदतो द्वारि न करोम्यद्य रक्षणम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति