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आदि पर्व
अध्याय २०५
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वैशम्पाय़न उवाच
अनास्तिक्यं च सर्वेषामस्माकमपि रक्षणे |  १५   क
प्रतितिष्ठेत लोकेऽस्मिन्नधर्मश्चैव नो भवेत् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति