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आदि पर्व
अध्याय २०५
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वैशम्पाय़न उवाच
अनुप्रवेशे राज्ञस्तु वनवासो भवेन्मम |  १७   क
अधर्मो वा महानस्तु वने वा मरणं मम |  १७   ख
शरीरस्यापि नाशेन धर्म एव विशिष्यते ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति