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आदि पर्व
अध्याय २०५
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वैशम्पाय़न उवाच
एवं विनिश्चित्य ततः कुन्तीपुत्रो धनञ्जय़ः |  १८   क
अनुप्रविश्य राजानमापृच्छ्य च विशां पते ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति