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आदि पर्व
अध्याय २०५
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वैशम्पाय़न उवाच
धनुरादाय़ संहृष्टो व्राह्मणं प्रत्यभाषत |  १९   क
व्राह्मणागम्यतां शीघ्रं यावत्परधनैषिणः ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति