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आदि पर्व
अध्याय २०५
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वैशम्पाय़न उवाच
सोऽभिवाद्य गुरून्सर्वांस्तैश्चापि प्रतिनन्दितः |  २३   क
धर्मराजमुवाचेदं व्रतमादिश्यतां मम ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति