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वन पर्व
अध्याय १८४
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तार्क्ष्य उवाच
न हि त्वय़ा सदृशी काचिदस्ति; विभ्राजसे ह्यतिमात्रं यथा श्रीः |  १८   क
रूपं च ते दिव्यमत्यन्तकान्तं; प्रज्ञां च देवीं सुभगे विभर्षि ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति