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शान्ति पर्व
अध्याय १९४
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भीष्म उवाच
स मे भवाञ्शंसतु सर्वमेत; ज्ज्ञाने फलं कर्मणि वा यदस्ति |  ९   क
यथा च देहाच्च्यवते शरीरी; पुनः शरीरं च यथाभ्युपैति ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति