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शान्ति पर्व
अध्याय २०५
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गुरुरु उवाच
सत्त्वेन रजसा चैव तमसा चैव मोहिताः |  १७   क
चक्रवत्परिवर्तन्ते ह्यज्ञानाज्जन्तवो भृशम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति