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शान्ति पर्व
अध्याय २०५
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गुरुरु उवाच
तस्मात्सम्यक्परीक्षेत दोषानज्ञानसम्भवान् |  १८   क
अज्ञानप्रभवं नित्यमहङ्कारं परित्यजेत् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति