शान्ति पर्व  अध्याय २०५

गुरुरु उवाच

दोषाणामेवमादीनां परीक्ष्य गुरुलाघवम् |  २४   क
विमृशेदात्मसंस्थानामेकैकमनुसन्ततम् ||  २४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति