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आदि पर्व
अध्याय ६८
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वैशम्पाय़न उवाच
एकोऽहमस्मीति च मन्यसे त्वं; न हृच्छय़ं वेत्सि मुनिं पुराणम् |  २७   क
यो वेदिता कर्मणः पापकस्य; तस्यान्तिके त्वं वृजिनं करोषि ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति