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शान्ति पर्व
अध्याय २०५
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गुरुरु उवाच
दोषैर्मूलादवच्छिन्नैर्विशुद्धात्मा विमुच्यते |  २७   क
विनाशय़ति सम्भूतमय़स्मय़मय़ो यथा |  २७   ख
तथाकृतात्मा सहजैर्दोषैर्नश्यति राजसैः ||  २७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति