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शान्ति पर्व
अध्याय २०५
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गुरुरु उवाच
तस्मादात्मवता वर्ज्यं रजश्च तम एव च |  २९   क
रजस्तमोभ्यां निर्मुक्तं सत्त्वं निर्मलतामिय़ात् ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति