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शान्ति पर्व
अध्याय २०५
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गुरुरु उवाच
सद्भिराचरितत्वात्तु वृत्तमेतदगर्हितम् |  ३   क
इय़ं सा वुद्धिरन्येय़ं यय़ा याति परां गतिम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति