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शान्ति पर्व
अध्याय २०५
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गुरुरु उवाच
रजसा धर्मय़ुक्तानि कार्याण्यपि समाप्नुय़ात् |  ३१   क
अर्थय़ुक्तानि चात्यर्थं कामान्सर्वांश्च सेवते ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति