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शान्ति पर्व
अध्याय २०५
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गुरुरु उवाच
नाशुद्धमाचरेत्तस्मादभीप्सन्देहय़ापनम् |  ५   क
कर्मणो विवरं कुर्वन्न लोकानाप्नुय़ाच्छुभान् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति