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शान्ति पर्व
अध्याय २०५
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गुरुरु उवाच
यश्चाधर्मं चरेन्मोहात्कामलोभावनु प्लवन् |  ७   क
धर्म्यं पन्थानमाक्रम्य सानुवन्धो विनश्यति ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति