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वन पर्व
अध्याय २०५
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मार्कण्डेय़ उवाच
गुरू निवेद्य विप्राय़ तौ मातापितरावुभौ |  १   क
पुनरेव स धर्मात्मा व्याधो व्राह्मणमव्रवीत् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति