वन पर्व  अध्याय २०५

व्राह्मण उवाच

इहाहमागतो दिष्ट्या दिष्ट्या मे सङ्गतं त्वय़ा |  १४   क
ईदृशा दुर्लभा लोके नरा धर्मप्रदर्शकाः ||  १४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति