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वन पर्व
अध्याय २२१
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मार्कण्डेय़ उवाच
तद्धि घोरमसङ्ख्येय़ं गर्जच्च विविधा गिरः |  ३३   क
अभ्यद्रवद्रणे देवान्भगवन्तं च शङ्करम् ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति